दालों में आत्मनिर्भर बनेगा भारत, 2029 तक आयात खत्म करने के लिए 1 हजार करोड़ होंगे खर्च
नई दिल्ली। भारत को दालों की आपूर्ती के लिए किसी देश की तरफ नहीं देखना पड़ेगा। 2029 तक दालों के मामले में भारत आत्म निर्भर हो जाएगा। इसके लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक हजार करोड़ का प्रावधान किया है। निर्मला सीतारमण ने कहा, हमारी सरकार अब दलहन में आत्मनिर्भरता के लिए छह साल का मिशन शुरू करेगी। जिसमें तुअर (अरहर), उड़द और मसूर की दाल की पैदावार पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। भारत मुख्य रूप से कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, म्यांमार, मोजाम्बिक, तंजानिया, सूडान और मलावी से दालों का आयात करता है। इसके लिए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक लक्ष्य दिया गया है। लक्ष्य यह है कि साल 2029 तक देश में दालों की मांग को पूरा करने के लिए आयात पर भारत की निर्भरता को खत्म करना है। 2025-26 के केंद्रीय बजट में इस योजना के लिए 1,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इस पैसे से तीन दलहन फसलों के संबंध में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) आधारित खरीद और भंडारण की सुविधा प्रदान की जाएगी।
पिछले साल 4 जनवरी को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य घोषित किया था कि भारत 2028-29 तक दालों का आयात बंद कर देगा। अमित शाह ने नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (नेफेड) द्वारा तुअर (अरहर) खरीदने के कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा था, “दिसंबर 2027 तक देश को दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए। हम जनवरी 2028 से एक किलो दाल भी आयात नहीं करेंगे।” पिछले साल अल नीनो मौसमी पैटर्न के कारण दालों की कीमतें बढ़ गईं, जो अधिकांश भारतीयों के लिए प्रोटीन का एक सामान्य सोर्स है। जबकि 2015-16 के बाद से कुल घरेलू उत्पादन में 37 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिससे भारत को पहले ही आयात में कटौती करने में मदद मिली है। फिर भी, दालों में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है, जिससे कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। प्रोटीन आधारित दालों की कीमतों में तेजी इंफ्लेशन और घरेलू खर्च बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। पिछले साल दालों में इंफ्लेशन लगभग 17 फीसदी बढ़ी, जिसका मुख्य कारण लगातार दो सालों से खराब मौसम और खराब मानसून के कारण कम उत्पादन था।
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